Questions raised on farmers’ Bharat Bandh, why shut down imposed when all methods of protest available | लोकतंत्र में विरोध के तरीके ‘हजार’, फिर क्यों बंद किए गए सड़कें और बाजार?


नई दिल्ली: पर्दे के पीछे किसान नेता कुछ और कहते हैं और सड़कों पर कृषि कानूनों का विरोध करते हुए देश को बंद कर देते हैं. हम पूरे देश से पूछना चाहते हैं कि आपको भारत खुला चाहिए या आपको भारत बंद चाहिए. 

मुट्ठीभर किसानों ने बनाया देश को बंधक

हमारे देश के कुछ मुट्ठी भर किसानों ने विपक्षी दलों का समर्थन लेकर 135 करोड़ आबादी वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को सोमवार को बंद (Bharat Bandh) करने की कोशिश की. वे ये भूल गए कि भारत के 135 करोड़ लोग अब ना तो रुकेंगे और ना ही अपने लिए फैसले करने की ठेकेदारी किसी और को देंगे. 

इसलिए हम राकेश टिकैत और उनके साथियों से पूछना चाहते हैं कि इस देश के लोग काम पर जाएंगे या नहीं, इस देश की सड़कें खुली रहेंगी या नहीं. ये तय करने का अधिकार इन्हें किसने दिया. ये लोग अपने विरोध प्रदर्शन को तो लोकतांत्रिक अधिकार मानते हैं लेकिन उसी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के फैसले इन्हें मंज़ूर नहीं. इसलिए हम इनके आंदोलन को भी एक्सपोज करेंगे.

दिल्ली-गुरुग्राम बॉर्डर पर लगा भीषण जाम

सोमवार को किसानों के भारत बंद की वजह से दिल्ली गुरुग्राम बॉर्डर पर भीषण ट्रैफिक जाम लग गया. अनुमान है कि वहां लगभग पांच हज़ार गाड़ियां इस जाम में फंसी थीं. अगर हम मान लें कि एक कार में दो लोग भी बैठे थे तो इस हिसाब से 10 हजार लोग दिल्ली गुरुग्राम बॉर्डर पर किसान आन्दोलन की वजह से फंस गए. ये ट्रैफिक जाम भी इसलिए लगा क्योंकि किसानों को दिल्ली में प्रवेश करने से रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेडिंग की हुई थी.

हफ्ते के पहले दिन ज्यादातर लोगों ने सोचा होगा कि वो समय से अपने दफ़्तर या अपनी दुकान पहुंच जाएंगे. लेकिन किसान आन्दोलन की वजह से ऐसा नहीं हो सका. इसे विडंबना ही कहेंगे कि भारत में देश बंद (Bharat Bandh) करने वाले मुट्ठीभर लोगों के संवैधानिक अधिकारों का तो हवाला दिया जाता है. वहीं उन लाखों लोगों की बात कोई नहीं करता, जिनके अधिकारों को इस तरह के बंद में बन्द कर दिया जाता है.

भारत बंद के दौरान कहीं मुट्ठीभर किसानों ने हाइवे ही बंद (Bharat Bandh) कर दिए तो कहीं सुबह दफ़्तर के लिए निकले लोगों को ज़बरदस्ती वापस लौटा दिया गया. ट्रेनें रोकने से लेकर ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने तक, इस आन्दोलन में प्रदर्शन और बंद के नाम पर सबकुछ हुआ. ये विरोधाभास ही है कि जिस समय ये हज़ारों लोग इस भारत बंद की वजह से ट्रैफिक जाम में फंसे हुए थे. उस समय बंद को बुलाने वाले किसान नेता राकेश टिकैत अलग अलग न्यूज़ चैनलों को अपना इंटरव्यू दे रहे थे.

किसानों के भारत बंद में शामिल हुए राजनीतिक दल

आज आप एक बार जरा याद कीजिए कि आखिरी बार आपने ऐसा कौन सा भारत बंद देखा था, जो सफलता पूर्वक अपने उदेश्य हासिल कर पाया हो. 74 वर्षों के इतिहास में अगर किसी आंदोलन को सफलता मिली भी तो, वो बहुत तत्कालिक थी और जितनी देर में उस आंदोलन का निर्माण हुआ था, उससे कम समय में उसकी Expiry Date भी आ गई. उदाहरण के लिए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान पिछले साल नवम्बर महीने से अब तक तीन बार भारत बंद बुला चुके हैं, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ.

इसके विपरीत हर बार इस भारत बंद (Bharat Bandh) ने राजनीतिक रूप लिया. पिछली बार 26 मार्च को हुए भारत बंद को 20 राजनीतिक दलों ने समर्थन दिया था और इस बार ये संख्या इससे भी ज़्यादा हो गई. दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाक़ों को छोड़ दें तो देश में जहां भी भारत बंद के तहत सोमवार को प्रदर्शन हुए, उनमें किसानों की जगह राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता थे. यही इस बंद की सच्चाई है.

1862 में हुई थी पहली हड़ताल

भारत में हड़ताल और बंद की शुरुआत पहली बार कब और कहां हुई थी, इसकी ठीक ठीक तो कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. कुछ एतिहासिक दस्तावेज़ों में ये दावा है कि भारत में बंद (Bharat Bandh) और हड़ताल की शुरुआत 1862 में हुई थी, जब फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर हड़ताल पर चले गए थे. दरअसल वे Working Hours यानी अपने काम के घंटों को घटाकर 8 घंटे करवाना चाहते थे. ये बात तब की है, जब भारत अंग्रेज़ों का गुलाम था.

अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के लिए भारत बंद, सड़क बंद और बाजार बन्द जैसे कई तरीके अपनाए गए. इन तरीक़ों को अपनाने का मकसद था अंग्रेजों की सरकार को भारत से उखाड़ फेंकना. उस समय विरोध के अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीके इजाद करने वालों में सबसे आगे महात्मा गांधी थे और उन्होंने ये काम बहुत शानदार तरीके से किया भी.

उन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ एक भी गोली नहीं चलाई. लेकिन आंदोलनों के दम पर भारत को आजादी दिला दी. लेकिन आजादी के बाद भी भारत में आंदोलनों का सिलसिला समाप्त नहीं हुआ. हमारे देश के लोग कभी ये नहीं समझे कि अंग्रेज़ों के ज़माने में भारत बंद जैसे आन्दोलन इसलिए होते थे क्योंकि उस समय लोगों के पास संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार नहीं थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है

डॉ अंबेडकर ने किया था देश को आगाह

इस चुनौती को संविधान निर्माता डॉक्टर भीम राव अंबेडकर ने आज से 72 साल पहले ही महसूस कर लिया था. वर्ष 1949 में संविधान सभा में दिए अपने आखिरी भाषण में अंबेडकर ने कहा था कि भारत को अगर आगे बढ़ना है तो उसे प्रजातंत्र में विरोध जताने की उन परम्पराओं को छोड़ना होगा, जिनमें सत्याग्रह और असहयोग जैसे आन्दोलन किए जाते हैं. उन्होंने कहा था कि जब लोग संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था होते हुए भी पारम्परिक आन्दोलन को विरोध के तरीक़े के रूप में अपनाएंगे तो फिर आज़ादी को कोई मतलब नहीं रह जाएगा.

ये दुर्भाग्य ही है कि हमारे देश में अम्बेडकर के नाम पर खूब राजनीति तो हुई लेकिन किसी ने भी उनके विचारों को नहीं अपनाया. भारत के लोगों को आंदोलन और विरोध प्रदर्शनों का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत हासिल है. संविधान का यही आर्टिकल लोगों को अभिव्यक्ति की आजादी का मूलभूत अधिकार देता है. 

आंदोलन के नाम पर हो रही राजनीति

राजनैतिक पार्टियों के लिए ये आंदोलन Instant क्रांति का दिखावा करने के लिए एक उचित मंच बन जाते हैं. आंदोलनों के नाम पर विनाशकारी राजनीति होने लगती है, जबकि होना ठीक इसके विपरीत चाहिए. यानी विरोध करने का सकारात्मक तरीका अपनाना चाहिए. ये एक लंबा संघर्ष है, इसमें परिश्रम ज्यादा लगता है और किसी भी राजनैतिक पार्टी के पास ना तो इसके लिए धैर्य है, ना ही नीयत है.

अब हम आपको ये बताते हैं कि किसान भारत बंद (Bharat Bandh) की जगह और क्या कर सकते थे?
सड़कों को बंद करने के बजाय किसान अपने खेतों में डबल काम करके सरकार का विरोध जता सकते थे. इससे होता ये कि किसानों को आम लोगों का भी समर्थन मिलता और वो परेशान भी नहीं होते.

किसान चाहते तो सड़कों पर ट्रैफिक को रोकने के बजाय, ट्रैफिक जाम को खुलवाने के लिए सड़कों पर खड़े हो जाते. वो ऐसा करके अपनी मांगों को लोगों तक पहुंचा सकते थे. ये किसान आज वृक्षारोपण करके सरकार का विरोध दर्ज कराते तो देश में उनके आन्दोलन के प्रति एक सकारात्मक सोच देखने को मिलती.

थाईलैंड में कैब कंपनी ने किया अनोखा आंदोलन

Thailand की एक Cab कम्पनी ने ऐसा ही किया. कोविड की वजह से जब उसकी ढाई हजार गाड़ियां एक जगह खड़ी होने के लिए मजबूर हो गईं तो उसने इन गाड़ियों की छत पर खेती शुरू कर दी. देखते ही देखते वहां की सरकार के खिलाफ हुआ ये लोकल प्रोटेस्ट, ग्लोबल खबर बन गया.

किसान कृषि क़ानूनों का विरोध जताने के लिए अपने लोकतांत्रिक अधिकार का भी रास्ता अपना सकते हैं. इसके लिए वो 2024 के लोक सभा चुनाव में अपनी विचारधारा वाली सरकार को जितवा सकते हैं, जो इन कानूनों को सत्ता में आते ही खत्म कर दे.

किसान यूपी औप पंजाब में अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव में अपने इस लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन वो ऐसा करेंगे नहीं, क्योंकि हमारे देश के राजनेताओं को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है.

सिंगापुर में पीएम ने दी यूनियन को चेतावनी

आप इसे सिंगापुर के एक उदाहरण से भी समझ सकते हैं, जहां वर्ष 1980 में Singapore Airlines की Pilot यूनियन ने हड़ताल की थी. तब वहां के पहले प्रधानमंत्री ली कुआन यू ने उनकी मांगों को मानने के बदले, उन्हें काम पर वापस लौटने की चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा था कि अगर हड़ताल तुरंत खत्म नहीं हुई तो वो Singapore Airlines को बंद करके नए सिरे से शुरु करने के लिए तैयार हैं. इसके बाद हड़ताल खत्म हो गई थी. 

ये स्थित भी तब है जब सरकार इस आन्दोलन को खत्म कराने के लिए कई कोशिश कर चुकी है. पिछले 10 महीनों में केन्द्र सरकार किसानों से 11 दौर की बातचीत कर चुकी है. सरकार किसानों को ये भी कह चुकी है कि वो फसलों के Minimum Support Price की लिखित गारंटी देने के लिए तैयार है.

सरकार ने बातचीत में किसानों से ये भी कहा था कि वो तीनों कृषि कानून को 18 महीनों के लिए होल्ड पर डाल देगी. लेकिन किसान फिर भी नहीं माने. सरकार ने Electricity Amendment Bill 2021 को भी वापस लेने का वादा किया था, जिसके तहत किसान बिजली बिल में छूट चाहते हैं.

ये भी पढ़ें- तालिबान को मिलेगा संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देने का मौका? सिफारिश पर हो रहा विचार

सरकार ने किसानों पर अब तक नहीं की सख्ती

इसके अलावा केन्द्र सरकार ने किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए जो नियम बनाए थे, सरकार उन्हें भी किसानों की मांग पर वापस लेने के लिए तैयार थी. इसके बावजूद किसानों ने अपना प्रदर्शन ख़त्म नहीं किया.

सबसे अहम सरकार ने पिछले 10 महीनों में आन्दोलन कर रहे किसानों पर किसी तरह की बलपूर्वक कार्रवाई नहीं की. कोई लाठीचार्ज नहीं किया. वो भी तब जब इन कथित किसानों ने इसी साल 26 जनवरी को लाल किले में हिंसा की थी. पहले ऐसा नहीं होता था. 

वर्ष 1988 में जब राकेश टिकैत के पिता महेंद्र सिंह टिकैत गन्ने की ज्यादा कीमत के लिए 5 लाख किसानों के साथ दिल्ली के Boat Club पहुंच गए थे तो तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने इन किसानों को वहां से हटाने के लिए पानी, बिजली और खाने की सप्लाई रोक दी थी. कुछ रिपोर्ट्स कहती हैं कि किसानों को भगाने के लिए उस समय लाठीचार्ज भी किया गया था. लेकिन मौजूदा केन्द्र सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया.

LIVE TV





Source link

Leave a Comment