Fear of losing legislature haunts 6 MLAs who joined Congress from BSP | बसपा से कांग्रेस में शामिल हुए 6 विधायकों को सता रहा विधायकी जाने का डर, SC ने मांगा फाइनल जवाब


Jaipur: 2 साल पहले बसपा से कांग्रेस में शामिल हुए 6 विधायकों को अब अपनी विधायकी जाने का डर सताने लगा है. बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) की ओर से सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में इन विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने को अवैध बताने के मामले में अब सुप्रीम कोर्ट ने इन छह विधायकों से 4 सप्ताह के भीतर फाइनल जवाब मांगा है.

यह भी पढ़ेंः महंगाई के विरोध में ‘दांडी यात्रा’ निकालेगी Congress, विधानसभावार निकालेंगे पैदल मार्च

ऐसे में इन विधायकों के लिए ना माया मिली ना राम वाली स्थिति हो गई है यानी सदस्यता जाने का भी डर है और ना ही कांग्रेस (Congress) में मंत्री बन पाए हैं. वहीं, नौबत यहां तक आ गई है कि इन विधायकों में भी दो गुट बन गए हैं. छह में से चार विधायक दिल्ली में है तो 2 विधायकों ने देर रात मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (CM Ashok Gehlot) से मुलाकात कर उनके प्रति अपना भरोसा जाहिर किया है. गहलोत सरकार के लिए राहत की बात यह है कि अगर सुप्रीम कोर्ट इन विधायकों की सदस्यता खत्म करता है तब भी आंकड़ों के लिए लिहाज से सरकार पर किसी तरह का कोई संकट नहीं है.

ag

विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटकी हुई है.
बसपा (BSP) से कांग्रेस में शामिल हुए छह विधायकों को दलबदल कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट से जवाब मांगे जाने के बाद सदस्यता जाने का डर सताने लगा है. ये विधायक सदस्यता जाने के डर से अब कानूनी और राजनीतिक विकल्प तलाशने में जुट गए हैं. 6 में 4 विधायक राजेंद्र गुढ़ा, वाजिब अली, लाखन मीणा और संदीप यादव दिल्ली चले गए हैं जबकि 2 विधायकों जोगिंदर सिंह अवाना और दीपचंद खेरिया ने कल रात मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से उनके आवास पर मुलाकात की है. यानी इन छह विधायकों में भी दो खेमे बन गए हैं.

दिल्ली गए ये विधायक अब दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में जवाब पेश करने पर कानूनी राय लेने के अलावा वरिष्ठ नेताओं से भी मुलाकात करेंगे. दल बदल कानून के तहत बसपा विधायकों की सदस्यता पर लटकी तलवार से प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है. बसपा विधायकों की सदस्यता अगर रद्द होती है तो प्रदेश की कांग्रेस सरकार की स्थिति पर क्या असर होगा. इस पर बात करने से पहले आपको बताते हैं कि आखिर दल बदल विरोधी कानून  क्या है, जिसके तहत इन विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटकी हुई है.

क्या है दल बदल कानून
साल 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से देश में दल बदल विरोधी कानून पारित किया गया था. साथ हीं, संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसमें दल बदल विरोधी कानून शामिल को संशोधन के माध्यम से भारतीय संविधान से जोड़ा गया. इस कानून का उद्देश्य भारतीय राजनीति में दल बदल की कुप्रथा को खत्म करना था.

इस कानून के तहत अगर एक निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है या निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है.  साथ ही किसी सदन के सदस्य की ओर से पार्टी के विपरीत वोट किया जाता है या खुद को वोटिंग से अलग रखता है तो दल विरोधी कानून के तहत जनप्रतिनिधि को अयोग्य घोषित किया जा सकता है.

कानून के मुताबिक सदन के अध्यक्ष के पास सदस्यों को योग्य करार देने के संबंध में निर्णय लेने की शक्ति है.

दल बदल विरोधी कानून में कुछ ऐसी विशेष परिस्थितियों का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें दल बदल करने पर भी सदस्य को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकेगा. दल बदल विरोधी कानून में एक राजनीतिक दल को किसी अन्य राजनीतिक दल में और उसके साथ विलय करने की अनुमति दी गई है. बशर्ते कि उसके कम से कम दो तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हो. ऐसे मैं न तो दल बदल रहे सदस्यों पर कानून लागू होगा और ना ही राजनीतिक दल पर. इसके अलावा सदन के अध्यक्ष बनने वाले सदस्य को इस कानून से छूट प्राप्त होगी.

sa

कांग्रेस पार्टी पूरी तरीके से 6 विधायकों के साथ
बसपा से कांग्रेस में आए विधायकों को सुप्रीम कोर्ट में अब अपना फाइनल जवाब पेश करना है और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले में अगर बसपा के विधायकों की सदस्यता चली जाती है तो राजस्थान (Rajasthan News) की सियासत पर क्या असर होगा. इसे लेकर चर्चाएं शुरू हो गई है.

अगर इन 6 विधायकों की सदस्यता चली भी जाती है तो अशोक गहलोत सरकार को इससे कोई खतरा नहीं है. 200 विधायकों की संख्या वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 101 विधायक चाहिए. अभी कांग्रेस के 106 विधायकों के अलावा गहलोत सरकार को 13 निर्दलीय विधायकों, 1 आरएलडी विधायक, 1 सीपीएम विधायक का समर्थन हासिल है. दो सीट खाली हैं, जिन पर उपचुनाव होने हैं.

यह भी पढ़ेंः वित्त विभाग पहुंची सरपंचों से संबंधित फाइल, आज आदेश नहीं निकले तो प्रशासन गांवों के संग अभियान का बहिष्कार

हालांकि बसपा से कांग्रेस में आए विधायकों की सदस्यता जाने की स्थिति में कांग्रेस विधायकों की संख्या मौजूदा हालत में केवल 100 रह जाएगी. इन विधायकों पर तलवार लटकी देख मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खास नेताओं ने स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए मोर्चा संभाल लिया है. वहीं, मुख्य सचेतक महेश जोशी (Mahesh Joshi) ने कहा है कि कांग्रेस पार्टी की बेस्ट लीगल टीम इस मामले को हैंडल कर रही है. विलय की प्रक्रिया कानून सम्मत तरीके से हुई है. इस मामले में कांग्रेस पार्टी पूरी तरीके से 6 विधायकों के साथ है.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बसपा से कांग्रेस में आए उन छह विधायकों के भविष्य का निर्णय अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर है. अगर सुप्रीम कोर्ट में इन विधायकों की सदस्यता खत्म करने का फैसला सुनाती है तो निश्चित तौर पर इन विधायकों के साथ-साथ राजस्थान कांग्रेस सरकार के लिए भी बड़ा झटका होगा.





Source link

Leave a Comment